*गुरूची थोरवी(अभंग क्र.१०)*
गुरूची थोरवी | किती रे वर्णावी ||
मुलांना पाजवी | ज्ञानामृत || १||
गुरूचा महिमा | आहे जगी थोर |
वंदी सानथोर | मनोभावे ||२||
गुरूचे आशिष | होईल कल्याण |
आयुष्याची मान | उंच करी ||३||
जीवना आकार | गुरू रोज देती |
माठ घडवती | जणू गुरू ||४||
गुरूमुळे आज | धन्य हे जीवन |
जीवन पावन | जणू झाले ||५||
गुरू आशिर्वाद | यशाचे गमक |
घडवी बालक | गुरू श्रेष्ठ ||६||
गुरूचे महत्त्व | जगी ओळखावे |
सदा लीन व्हावे | गुरूपदी ||७||
गुरूचरणी या | ठेवावे मस्तक |
रक्तात धमक | येईल हो ||८||
हरभरा हो गुरुला | घ्यावी कधी भेट |
जाऊनिया थेट | कधीमधी ||९||
भक्ती शक्ती युक्ती | शिवबाचे गुरू ||
तुकोबांना स्मरू | शिवराय ||१०||
बालपणी गुरू | देतो रे आदर्श |
संस्काराचा स्पर्श | गुरूदेव ||११|
यश फळा येती | अवघड घाट |
गुरूविण वाट | कोण दावी ||१२||
सार जिवनाचे | आद्य गुरू स्मरा |
आनंदाने भरा | क्षण सारे ||१३||
मिनु म्हणे आता | पाया जिवनाचा |
गुरू हा ज्ञानाचा | खरा साथी ||१४||
कवयित्री
मिनाक्षी पांडुरंग नागराळे
जि.प.प्राथ.शाळा.कोकलगाव