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Monday, March 21, 2022

नको भ्रष्टाचार (अभंग क्र.१५)

 *नको भ्रष्टाचार(अभंग क्र.१५)


नको भ्रष्टाचार | ठेवा शिष्टाचार |

चांगले आचार | जिवनात ||


राजकारणात | खोटी अश्वासने |

जिंकतात मने | लोकांचे हो ||


फसवाफसवी | वाढत चालली|

जनता भुलली | प्रलोभनी ||


नविन योजना | ती कागदावरी |

बोलतो पुढारी | नेटानेच ||


रस्त्यात हो खड्डे|  खड्ड्यांचा रे देश|

पुढा-याचा जोश |वाढतोच ||


टेबलाखालून | घेतात रे नोटा |

तुडवीतो वाटा | भ्रष्टाचारी ||


इडीची चौकशी | लपविती धन

सैरभैर मन | आपसूक ||


रस्त्यात घोटाळा | निधीत घोटाळा |

धंदाच हो काळा | फसव्यांचा ||


शरीफ ते चोर | वर शिरजोर|

हे हरामखोर | असतात||


मिनु म्हणे आता | चुकीचं वागणं|

कुत्र्याचं जगणं | सोडा सोडा ||


कवयित्री

मिनाक्षी पांडुरंग नागराळे

जि.प.प्राथ.शाळा.कोकलगाव

ता.जि.वाशिम

स्थापू समानता (अभंग क्र.१६)

 *स्थापू समानता(अभंग क्र.१६)


स्थापू समानता | मिटवूया दरी |

नको सल उरी | कसलीही ||


स्त्रीपुरूष चाके | संसाररथाची |

साथ एकोप्याची | असू द्यावी ||


काळा आणि गोरा | नको भेदभाव |

मन ही पहावं | तपासूनी ||


एकाच देवाची | लेकरे हो सारी |

जन्माची ही वारी | बा विठ्ठला ||


गरीब-श्रीमंत | मिटवूया दरी |

भावना ही बरी | असू द्यावी ||


उच-निच नाही | जगात या कोणी |

समतेची गाणी | गावूयात ||


सानथोर सारे | ठेवा एक ध्यानी |

नको मनमानी | आपुलीच ||


जात धर्म पंथ | मानवाने केले |

वर्ण ही निर्मिले | स्वार्थापोटी ||


सोडून द्या सारे | स्थापू समानता |

मानवी एकता | जोडू चला ||


मिनु म्हणे आता | धाव बा विठ्ठला |

विनविते तुला | पांडुरंगा ||


कवयित्री

मिनाक्षी पांडुरंग नागराळे

जि.प.प्रा.शाळा.कोकलगाव

ता.जि.वाशिम

शंभू महादेवा (अभंग क्र.१७)

 शंभू महादेवा (अभंग क्र.१७)*


त्रिशूळ डमरू | घेऊनिया हाती |

सोबती पार्वती | महादेवा ||


समुद्र मंथन | विष हो प्राशिले |

हाकेस धावले | देवतांच्या ||


निळकंठ नाम | उदयास आले |

महादेव बोले | पाठीराखा ||


संकटमोचक | शंभू महादेव |

नाही कधी भेव | भक्तालागी ||


ॐ नमः शिवाय | करूयात जप |

आरती व धूप | आवडीचे ||


पांढरा धोतरा | आवडीचे फूल |

अंगीवरी झूल | नंदीच्याही ||


वाघांचे कातडे | देवाचे आसन |

करितो वंदन | महादेवा ||


नंदीवर स्वार | कैलास पर्वत |

पार्वती सोबत | असे सदा ||


भक्ताच्या पाठीशी | राही महादेव |

कशास रे भेव | तुज भक्ता ||


मिनू म्हणे आता | शंभू महादेवा |

धावा तूम्ही घ्यावा | भक्ताचिया ||


कवयित्री

मिनाक्षी पांडुरंग नागराळे

जि.प.प्राथ.शाळा.कोकलगाव

ता.जि.वाशिम

करू नये गर्व (अभंग क्र.१८)

 करू नये गर्व (अभंग क्र.१८)


जीवनात कधी | करू नये गर्व |

देवाहाती सर्व | आहे सारे ||


भलेभले आले | येऊनिया गेले |

मातीतच मेले | ठेव ध्यानी ||


चार दिवसाचे | प्रवासी आपण |

कशाला मीपण | आणतोस ||


रित्या हाती येणं | रित्या हाती जाणं |

मीरवी मीपण | कशापायी ||


माणुसकी भली | कधी कळणार |

कसे मरणार | एकदिन ||


अहंभाव खोटा | सोडी माणुसकी |

वरवर एकी | दाखवती ||


मनात गं अडी | जळाजळी सारी |

मीही आहे भारी | तोरा दावी |


कधी शिकणार | माणुसकी भली |

आली तशी गेली | जीवनात ||


कधी संपत्तीचा | गर्व नका करू |

गुढी हो उभारू | माणुसकी ||


मिनु म्हणे आता | सोड अहंभाव |

सोडून दे हाव | माणसा तू ||


कवयित्री

*मिनाक्षी पांडुरंग नागराळे*

जि.प.प्राथ.शाळा.कोकलगाव

माणुसकीचा रंग (अभंग क्र.१९)

 माणुसकीचा रंग (अभंग क्र.१९)


हा माणुसकीचा | एक रंग लावू |

माणुसकी दावू | माणसाला ||


प्रेमाचा तो रंग | खुलवी मनाला |

प्रत्येक क्षणाला | मानवाच्या ||


नात्यांचा तो रंग | स्नेहाने जपूया |

नाते टिकवूया | सारेजण ||


रंग कर्तव्याचा | कर्तव्य करूया |

मने ही जोडूया | एकमेका ||


रंग मदतीचा | सहकार्य करू |

गुढी हो उभारू | मदतीची ||


रंग तो भक्तीचा | श्रध्दा जपूयात |

भक्ती करूयात | देवाभाव ||


त्या समाधानाचा | एक रंग ठेवू |

आनंदे जगवू | सा-यांनाच ||


तो आपुलकीचा | एक लावू रंग |

अनाथाच्या संगे | राहु चला ||


जाणिवेचा रंग | असू द्यावा आधी |

कशाची ना व्याधी | नसेल गा ||


मिनू म्हणे आता | कर्तव्याचे माप |

जप मायबाप | ठेव ध्यानी ||


*मिनाक्षी पांडुरंग नागराळे*

*जि.प.प्राथ.शाळा.कोकलगाव*

सोड कुविचार (अभंग क्र.२०)

 सोड कुविचार (अभंग क्र.२०)


सोड कुविचार | चांगले वर्तन |

हे परिवर्तन | आण आता ||


जशी दृष्टी तशी | सृष्टी रे भासेल |

जग ही दिसेल | तैसे तैसे ||


कुप्रथांची होळी | जाळून तू टाक |

संसाराचे चाक | फिरे बघ ||


राग,द्वेष, आणि | आसूया तू सोड |

कर तडजोड | थोडीतरी ||


प्रेम आपुलकी | जप ना रे थोडी |

जीवनात गोडी | वाढेल गा ||


अहंकार जाळ | यंदाच्या होळीत |

सुख हो झोळीत | येईल हो ||


सत्कर्म करावे | साधा परमार्थ |

जीवन यथार्थ | होईल रे ||


कष्टाची भाकरी | चाखूनिया खावी |

संस्कृती जपावी | आपुलिया ||


हे सण उत्सव | संस्कृती ही थोर |

पाश्र्चात्यांसमोर | श्रेष्ठ आहे |


मिनू म्हणे आता | सोड कुविचार |

चांगले आचार | ठेव सदा ||


कवयित्री

मिनाक्षी पांडुरंग नागराळे

जि.प.प्राथ.शाळा.कोकलगाव

कर्तव्य (अभंग प्रकार)

 *कर्तव्य(अभंग प्रकार)*


कर्तव्य आपुले | पुर्ण करावेत |

सदा जाणिवेत | असू द्यावे ||१||


मनी देशसेवा | सदा बाळगावी |

मूल्ये ही जपावी | माणसाने ||२||


कष्टाचीच खावी | आपुली भाकरी |

कशाला रे चोरी | करतोया ||३||


कर्तव्याचे माप | मातापिता थोर |

सेवा तू ही कर | मनोभावे ||४||


भुकेला तान्हेला | कधी ओळखावा |

देव ही  जाणावा | माणसात ||५||


गरीबां मदत | सढळ हाताने |

मोकळ्या मनाने | करावेत ||६||


शुद्ध आचरण | ठेव तू माणसा |

खोटा तो जलसा | कशापायी ||७||


कर्तव्याची दोर | ठेव मजबूत |

दान करावेत | कधीमधी ||८||


मानलाचा जन्म | एकदाच मिळे |

ज्याला खरे कळे | पुण्यवान ||९||


मिनू म्हणे आता | कर्तव्य चांगले |

होईल रे भले | जीवनाचे ||१०||


कवयित्री

मिनाक्षी पांडुरंग नागराळे

जि.प.प्राथ.शाळा.कोकलगाव

ता.जि.वाशिम







मिनाक्षी नागराळे यांच्या वत्सगुल्मी काव्यसंग्रहाचे आंबेडकरी साहित्य संमेलनामध्ये प्रकाशन

 मिनाक्षी नागराळे (महाराष्ट्र राज्य शासन आदर्श शिक्षिका पुरस्कृत) यांच्या 'वत्सगुल्मी' संपादीत काव्यसंग्रहाचे प्रज्ञा सा...